रामो विग्रहवान् धर्मः
रामो विग्रहवान् धर्मः - गिरीश जोशी
वाल्मीकि रामायण का एक श्लोक है - रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्य पराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥“ अर्थात – श्री राम धर्म के विग्रह स्वरूप हैं। वे सच्चे साधू एवं पराक्रमी हैं। जैसे देवगणों के राजा इंद्र हैं। वैसे ही प्रभु श्री राम हम सब के राजाधिराज हैं। श्री राम धर्म का विग्रह है, विग्रह यानी प्रतिमा या मूर्ति। वास्तव में सनातन धर्म या हिंदू धर्म की अनेक परिभाषाएं हजारों वर्ष के कालखंड में अनेक विद्वान ऋषि मुनियों के साथ- साथ आधुनिक चिंतकों एव विचारकों ने भी दी है। इस श्लोक में महर्षी वाल्मिकी भगवान श्री राम को धर्म का साकार स्वरूप बता रहे हैं।
धार्मिक कौन होता है
धर्म के बारे में कहा जाता है कि वो अमूर्त है। शास्त्रों में कहा गया है-“ धारयते इति धर्म:” - जो धारण किया जाता है वह धर्म है । हम अपने जीवन में जीवन में वस्त्र को धारण करते हैं, कुछ लक्षणों को धारण करते हैं, आचरण का धारण किया जाता है। जब किसी व्यक्ति के आचरण में, प्रत्येक कृति में, वचन में, लक्ष्य में ,संकल्प में, प्रतिज्ञा में केवल और केवल धर्म ही परिलक्षित होता है तब उस व्यक्ति को वास्तविक रूप से धार्मिक कहा जाता है और इसी धार्मिक व्यक्तित्व का आदर्श स्वरूप युगों –युगों में सृष्टि में यदि कोई हुआ तो वह भगवान श्री राम हैं ।
धर्म के लक्षण
धर्म के लक्षणो के बारे में मनुस्मृति में लिखा गया है -"धृति:क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।" अर्थात धृति (धैर्य ),क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ),अस्तेय (चोरी न करना ),शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ),इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ),धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ),विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ), सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना ) यह धर्म के दस लक्षण हैं। यानि इन दस लक्षणों से युक्त व्यक्ति वास्तव में धार्मिक होता है ।
भगवान श्री राम का व्यक्तित्व
इस परिभाषा के दृष्टिकोण से भगवान राम के व्यक्तित्व को देखा जाए तो उनके व्यक्तित्व के प्रत्येक आयाम में उक्त दसों लक्षण प्रतिबिंबित होते हुए दिखाई देते हैं।
उदाहरण के लिए श्री राम की जब अयोध्या के राजा के रूप में राज्याभिषेक होने वाला था उसके एक दिन पूर्व ही उन्हें 14 वर्षों के वनवास के लिए जाना पड़ा। आज किसी व्यक्ति के लंबे समय पर पद में बने रहने के बाद उसे पद को छोड़ने का मोह बड़ी कठिनाई से छूट पाता है। किसी भी पद को पाने के लिए व्यक्ति किसी भी स्तर तक जाने के लिए आज तैयार दिखता है। लेकिन भगवान राम ने अत्यंत धैर्य से अपने पिता के वचन का पालन किया। 14 वर्षों तक जिस प्रकार के संकटों को उन्होंने सहा वो धैर्य की पराकाष्ठा कहे जा सकते हैं।
वनवास के षड्यंत्र को रचने वाली मंथरा के प्रति श्री राम के मन में कभी किसी प्रकार का राग अथवा द्वेष उत्पन्न हुआ हो ऐसा दिखाई नहीं देता। उन्होंने मंथरा को कोई सजा न देने के निर्देश भी वन जाते समय दिए थे। क्षमाशीलता के गुण का ये एक अद्भुत उदाहरण है।
श्री राम का धर्म बोध
वन में निवास करते समय,राम रावण युद्ध के समय मृत्यु शैया पर पड़े रावण से ज्ञान अर्जन के लिए लक्ष्मण को भेजे जाने वाली घटना भी इंद्रिय संयम का अद्भुत उदाहरण है।
श्री राम के जीवन में उनके द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म सत्कर्म के रूप में ही दिखाई देते हैं। कुछ लोग मानते हैं की श्री राम ने अपने जीवन में कुछ काम ऐसे किए हैं जो धर्म की परिधि में नहीं आते,अपनी बात को सही साबित करने के लिए ये लोग बाली के वध का उदाहरण देते हैं। लेकिन यदि हम देखें कि इस पेचीदा प्रकरण में उन्होंने जो निर्णय लिया था उसके पीछे उनका इरादा अधर्मी- अत्याचारी बाली के वध का था। शास्त्रों मे कहा गया है कि किसी कर्म का फल, कर्ता को उस कर्म के पीछे कि भावना या नियत के आधार पर मिलता है कृति के आधार पर नहीं । जब अधर्म का संहार करना हो तब विवेक का उपयोग करना पड़ता है। अधर्मी का नाश करने के लिए यदि किसी प्रकार के युद्ध नियम की अनदेखी करना पड़े तो करना चाहिए है क्योंकि यहाँ लक्ष्य अधर्म के विनाश का, धर्म की स्थापना का होता है। इसलिए बाली के वध का तरीका धर्म सम्मत ही माना गया है।
धर्म का विवेक
कालांतर में युद्ध करते समय विवेक का उपयोग नहीं करने पर हमारे समाज को अपना धर्म एवं संस्कृति की रक्षा करने के लिए सैकड़ों वर्षों का संघर्ष विदेशी आक्रांताओं से करना पड़ा है।
तत्कालीन युद्ध नियमों के आधार पर देखें तो रावण का वध करने के बाद विजेता के रूप में लंका पर विजय पाकर वास्तव में आधिकारिक रूप से श्रीराम स्वयं राजा बन सकते थे किंतु उन्होंने स्वयं राजा बनने के स्थान पर लंका का राज्य विभीषण को सौंपा। अस्तेय का अर्थ ही होता है दूसरे की वस्तु को उस वस्तु के स्वामी की इच्छा के बिना अपने पास नहीं रखना। कुछ इसी तरह का कार्य उन्होंने बाली के वध के बाद सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बना कर किया था।
अहिल्या को पत्थर की तरह जड़ होने का श्राप मिला था। उस अहिल्या श्रीराम के पावन स्पर्श मात्र से ही जड़ता समाप्त हो गई। ये तभी संभव है जब उस व्यक्ति का रोम -रोम शुद्ध -पवित्र हो, निर्मल हो। विद्या अध्ययन हेतु भी श्री राम हमें हमेशा आगे बढ़कर पहल करते हुए ही दिखाई देते हैं।
धर्म ज्ञान जिज्ञासा
महर्षि वशिष्ठ द्वारा जब उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया तब उत्तरों का संकलन करीब बत्तीस हजार श्लोकों में सामने आया जिसे आज हम ‘योगवाशिष्ठ’ के नाम से जानते हैं । श्रीराम ने युवराज होने के बाद और राजा बनने के बीच की अवधि में ये ज्ञान ग्रहण किया है जिस अवस्था में व्यक्ति ये मान के चलता है कि अब मेरी शिक्षा पूर्ण हो गई है और अब मैं राजा बनाने वाला हूँ या कोई बड़ा पद प्राप्त कर चुका हूँ तो मुझे कुछ नया सीखने की क्या आवश्यकता है। लेकिन श्री राम ने महर्षि वशिष्ठ के चरणों में बैठकर सृष्टि के रहस्य, मानव जीवन का लक्ष्य, ब्रम्हांड़ का सत्य आदि का संपूर्ण ज्ञान ग्रहण किया जो उनकी अध्ययनशीलता का द्योतक है एवं धर्म के ‘धी’ लक्षण को इंगित करता है ।
श्री राम के जीवन में सत्य प्रति क्षण उद्घाटित होता दिखाई देता है उन्होंने कभी किसी भी छोटे से लाभ के लिए भी सत्य से मुंह बड़ा हो ऐसा संपूर्ण जीवन में कहीं दिखाई नहीं देता।
अक्रोध का अंतिम धर्म लक्षण तो भगवान श्री राम के जीवन में सदैव दिखाई देता है । जब लंका जाने के लिए अनुविनय करने बाद भी समुद्र तीन दिनों तक मार्ग नहीं देता तब भगवान कहते है - विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।। इस प्रसंग पर श्रीराम के सागर पर कुपित होने के के बारे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है, लेकिन सागर के द्वारा प्रकट होकर सेतु निर्माण का उपाय बताने पर उनके कोप का शमन हो जाता है । श्री राम ने रावण से युद्ध भी प्रतिशोध लेने की नियत से क्रोध के भाव में नहीं किया अपितु दुष्ट के संहार एवं धर्म की स्थापना के भाव से किया था।
धर्म स्थापना
भारत मे धर्माधिष्ठित समाज एवं धर्म पारायण व्यक्ति के निर्माण हेतु हमारे पूर्वजों ने श्री राम को न केवल सोलह संस्कारों की समस्त विधियों में शामिल किया अपितु सुबह की राम - राम से लेकर जीवन के नवरसों की अभिव्यक्ति के साथ जीवन के हर पहलू में और अंतिम क्षण तक धर्म की स्थापना करने के लिए विभिन्न माध्यमों से मानव चेतना की गहराइयों में अनंत काल तक श्री राम को स्थापित किया गया है ।
इसीलिए श्री राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र अयोध्या के लोगो में भी लिखा गया है - “रामो विग्रहवान् धर्मः”
- गिरीश जोशी
संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार
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