भगवान विठ्ठल और संत ज्ञानेश्वर के युवा पीढ़ी के लिए सबक (आषाढ़ एकादशी के निमित्त विशेष आलेख)

भगवान विठ्ठल और संत ज्ञानेश्वर के युवा पीढ़ी के लिए सबक (आषाढ़ एकादशी के निमित्त विशेष आलेख)

भगवान विठ्ठल और संत ज्ञानेश्वर के युवा पीढ़ी के लिए सबक (आषाढ़ एकादशी के निमित्त विशेष आलेख)

 - गिरीश जोशी

हाल ही में  स्टॅंडर्ड चार्टर्ड बँक के सीईओ बिल विंटर्स ने एक इंटरव्यू में  कहा के आज टेक्नॉलॉजी खासकर AI वह सब कुछ कर रही है जो पहले इंसान करते थे,  जैसे- कोड लिखना, प्रेजेंटेशन बनाना, डॉक्युमेंट तैयार करना, ऐसे में असली जरूर सॉफ्ट स्किल की है जो मशीन नहीं दे सकती।  जैसे - करुणा, संवाद, लीडरशिप और नैतिक विवेक . विंटर्स ने युवाओं  को सलाह दी है कि वे केवल तकनीकी योग्यता के पीछे भागने के अलावा करुणा, आलोचनात्मक सोच व जिज्ञासा को अपनी ताकत बनाये। आज कॉर्पोरेट ऐसे लोगो की तलाश मे है जो टीम का मनोबल समझ सके और सही दिशा मे निर्णय ले सके। विश्व की टॉप  कंपनियों में से एक डेलाइट की 2024 की रिपोर्ट भी यही कहती है  कि सर्वाधिक डिमांड (65%) टीमवर्क, कम्युनिकेशन स्किल (61%),  लीडरशिप (56%)  है।  

 विंटर्स ने युवाओं अनेक गुणों को अपने अंदर बढ़ाने के लिए कहा है। इन गुणों को बढ़ाने के लिए कोई एक आधार, उपास्य,आदर्श  सामने होना आवश्यक होता है । आदर्श ऐसा हो जो पिछले अनेक वर्षों से असंख्य पीढ़ियों  को प्रेरित कर रहा हो और भविष्य में भी अनेक वर्षों तक प्रेरित करता रहेगा।

ऐसा एक उपास्य, आदर्श भगवान श्री कृष्ण का वह रूप जिसे महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के आराध्य भगवान विठ्ठल के नाम से भी जाना जाता है।गौरतलब है कि अपने देश के दोनों राज्य समृद्ध राज्यों में से है साथ ही आज करोड़ों युवाओं की महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का जरिया भी बने हुए हैं।

महान संत कवि तुकाराम ने अपने एक अभंग में 'विठोबा' शब्द का अर्थ बताया है — ‘ज्ञान’ + ‘ठोबा’ अर्थात ‘रूप’; इस प्रकार विठोबा का अर्थ है ‘परम ज्ञान का रूप’ या ‘परम ज्ञान की मूर्ति’। एक मान्यता यह भी है कि ‘वी’ का अर्थ है गरुड़ पक्षी और ‘ठोबा’ का अर्थ है बैठने का स्थान, इसलिए विठोबा का अर्थ होता है ‘गरुड़ पर विराजमान देवता’।

विठोबा भगवान विष्णु का ही रूप हैं, जो ईंट पर पिछले 28 युग से अपने दोनों हाथ कमर पर रख कर खड़े है। 
भगवान  श्रीकृष्ण को श्रीविष्णु का अवतार माना जाता है, जिनका अवतरण द्वापर युग के अंत में, बुधवार (श्रावण वद्य अष्टमी) के दिन हुआ था। 

शास्त्रों में एक श्लोक है - 
"वि करो विधातय, था करो नीलकंठाय ।  ला करो लक्ष्मीकांत, विठ्ठलाभिधिनीयमे  ।।

इसका अर्थ है - 
‘वि’ का संबंध विधाता यानी ब्रह्मा से है,‘था’ का नीलकंठ भगवान शिव से,
और ‘ला’ का लक्ष्मीकांत भगवान विष्णु से। अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश — ये तीनों देवता ‘विठ्ठल’  में समाहित हैं।

संत ज्ञानेश्वर ने भक्ति परंपरा में भगवान विट्ठल को आराध्य के रूप में स्थापित कर मनुष्य के सर्वांगीण उन्नति के लिए उसके भीतर छुपे गुणों का विकास किया।

संत ज्ञानेश्वर ने भगवान श्री कृष्ण के युगानुकूल संदेश भागवत गीता को सरल और सहज भाषा में लोक समाज के बीच पहुंचाने के लिए ’ज्ञानेश्वरी’ के रूप में उसका सरल भाष्य सबके सामने रखा ।

ज्ञानेश्वरी अध्याय 12 में संत ज्ञानेश्वर ने लिखा है - "करुणा हाचि धर्म" - करुणा ही सच्चा धर्म  है। इसे विंटर्स ने युवाओं के लिए प्रथम आवश्यक गुण बताया है।
 
करुणा को आवश्यक माना गया है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि करुणा से ही मानव को अपना इष्ट मिलता हैं। करुणा एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को नम्र, समझदार और स्नेह करने वाला बनाता है। करुणा से व्यक्ति तथा समाज की बुरी बातें कम होती हैं और अच्छे गुण बढ़ते हैं।करुणा की वजह से हम दूसरों का दुःख समझते हैं और उनकी मदद करने की इच्छा होती है।

करुणा से व्यक्ति में क्षमा करने की क्षमता आती है और वह दूसरों को आसानी से क्षमा कर पाता है। 

संत ज्ञानेश्वर द्वारा स्थापित वारकरी संप्रदाय की परंपराओं का पालन कर  साधारण परिस्थिति में जन्मे अनेक लोग संत बने है, इसी कड़ी में संत नामदेव का नाम बहुत बड़ा है।

 संत नामदेव की एक कथा बड़ी प्रसिद्ध है एक बार वे भोजन की तैयारी कर रहे थे तभी एक कुत्ता उनकी थाली से रोटी लेकर दौड़ पड़ा लेकिन संत नामदेव के मन में करुणा का भाव प्रबल था। वे घी की कटोरी लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े और कहने लगे कि प्रभु  अभी रोटी पर घी नहीं लगा है, कृपया घी लगवाकर खाइए। यह भाव इसलिए जागा क्योंकि प्रत्येक प्राणी मात्र में उस ईश्वरीय चैतन्य का दर्शन उन्हें होने लगा था यह करुणा के भाव का सर्वोच्च शिखर है। 
अध्याय 4 में ज्ञानेश्वर कहते है - 
"विवेकेंवीणें ज्ञान, तेथें अज्ञानचि प्रमाण" अर्थात ज्ञान के साथ यदि विवेक (समझ) नहीं है, तो वहाँ अज्ञान ही अधिक प्रभावी  हो जाता है।

"विवेकेंवीणें भजन, तेथें अभिमानचि प्रमाण" अर्थात अगर भजन या केवल भाषण विवेक के बिना किया जाए, तो उसमें अहंकार ही ज़्यादा होता है।अगर कर्म विवेक के बिना किया जाए, तो वह बंधन का कारण बनता है।

"विवेके देहबुद्धी जाये, मग स्वरूपचि होये" (अध्याय 5)
विवेक के कारण देह (शरीर) यानी मैं की भावना मिटती है और हम अपने वास्तविक स्वरूप को अपनी शक्ति को जान पाते हैं।
"विवेकेचि आपण, आपणपेंचि जाणे" (अध्याय 6)विवेक के माध्यम से ही हम स्वयं को पहचान सकते हैं।
"विवेकेवीण संसार, तोचि केवळ विकार" (अध्याय 8)
विवेक के बिना संसार सिर्फ दोषों और विकारों से भरा होता है।

"विवेकेवीणें देह, तोचि केवळ देह" (अध्याय 10) विवेक के बिना शरीर, केवल एक शरीर ही रह जाता है – उसकी कोई सार्थकता शेष नहीं रहती है 
'अध्याय 12' के अनुसार, सच्चा लीडर वही होता है जो ईश्वर को पूरी तरह समर्पित होकर अपना काम करता है।
'अध्याय 18'  के अनुसार, हर व्यक्ति को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और फल की इच्छा किए बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।
ज्ञानेश्वरी समानता और न्याय पर ज़ोर देती है।

आज के विद्यार्थियों को कोई भी बड़ी  योजना बनाते समय SWOT एनालिसिस करना सिखाया जाता है। जिसमें S का अर्थ होता है Strength यानी शक्ति,  W - Weakness यानी हमारी कमजोरी O - Opportunity यानी हमारे सामने संभावित अवसर तथा  T - Threat यानी मार्ग में आने वाली बाधाएं।
 संत ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी के माध्यम से आत्म निरीक्षण करते हुए आज से 800 वर्ष पूर्व SWOT एनालिसिस कर स्वयं का विकास करने का युगानूकूल मार्ग बताया था।

ज्ञानेश्वर महाराज ने वारकरी संप्रदाय के माध्यम से यह सिद्ध करके भी दिखाया।  संत ज्ञानेश्वर महाराज के मार्ग पर चल कर विभिन्न समाज से अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से निकले महापुरुष इसका प्रमाण है।

कुछ प्रमुख संत है तुकाराम महाराज, संत एकनाथ महाराज, संत नामदेव महाराज, संत सेना महाराज(सेन समाज), संत नरहरी महाराज(सोनी समाज),संत गाडगे महाराज(रजक समाज), संत सावता महाराज(माली समाज) संत चोखामेळा महाराज (महार समाज)आदि।

आषाढ़ एकादशी के अवसर पर इन संतों के अलावा अनेक संतों के मूल स्थान से उनकी चरण पादुकाओं को लेकर  लाखों की संख्या में भक्त भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुंचते हैं। और भगवान विट्ठल के चरणों में अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। 

आज की युवा पीढ़ी को भी अपने शास्त्रों में लिखें  कालजयी और युगानुकूल शाश्वत मूल्यों के प्रकाश में भविष्य का मार्ग देख कर अपना और अपने राष्ट्र का भवितव्य गढ़ने की आवश्यकता है।

गिरीश जोशी
संस्कृति अध्येता और अकादमिक प्रशासक
9425062332
girish.joshi0909@gmail.com