।।भगवती सीताजी की शक्ति तथा पराक्रम।।

।।भगवती सीताजी की शक्ति तथा पराक्रम।।

#जानकी_जयन्ती

।।भगवती सीताजी की शक्ति तथा पराक्रम।।

एक बार भगवान् श्रीराम जब सपरिकर सभा में विराज रहे थे, विभीषणजी बड़ी विकलतापूर्वक अपनी स्त्री तथा चार मन्त्रियों के साथ दौड़े आये और बार-बार उसाँस लेते हुए कहने लगे— 'राजीवनयन राम ! मुझे बचाइये, बचाइये। कुम्भकर्ण के पुत्र मूलकासुर नामक राक्षस ने, जिसे मूल नक्षत्र में उत्पन्न होनेके कारण कुम्भकर्ण ने वन में छुड़वा दिया था, जिसने शरीर पर मधुमक्खियों को पाल लिया था, तरुण होकर तपस्या के द्वारा ब्रह्माजी को प्रसन्न कर उनके बल से गर्वित होकर बड़ा भारी ऊधम मचा रखा है। उसे आपके द्वारा लङ्का-विजय तथा मुझे राज्य-प्रदान की बात मालूम हुई तो पातालवासियों के साथ दौड़ा हुआ लंका पहुँचा और मुझ पर धावा बोल दिया। जैसे-तैसे मैं उसके साथ छः महीने तक युद्ध करता रहा। गत रात्रि में मैं अपने पुत्र, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग से भागकर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि 'पहले भेदिया विभीषण को मारकर फिर पितृहन्ता राम को भी मार डालूँगा। सो राघव ! वह आपके पास भी आता ही होगा; इसलिये ऐसी स्थिति में आप जो उचित समझते हों, वह तुरंत कीजिये।'

भक्तवत्सल भगवान् श्रीराम के पास उस समय यद्यपि बहुत-से अन्य आवश्यक कार्य भी थे, तथापि भक्तकी करुण कथा सुनकर उन्होंने अपने पुत्र लव, कुश तथा लक्ष्मण आदि भाइयों एवं सारी वानरी सेना को तुरंत तैयार किया और पुष्पकयान पर चढ़कर झट लङ्का की ओर चल पड़े। मूलकासुर को राघवेन्द्र के आने की बात मालूम हुई तो वह भी अपनी सेना लेकर लड़ने के लिये लङ्का के बाहर आया। बड़ा भारी तुमुल युद्ध छिड़ गया। सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा बड़ी कठिन समस्या उत्पन्न हो गयी। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान्‌जी बराबर संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते ही रहे, पर युद्ध का परिणाम उलटा ही दीखता रहा। भगवान्  कल्पवृक्ष के नीचे बैठे थे। मूलकासुर अभिचार-होम के लिये गुप्तगुहा में गया था। विभीषण भगवान्‌ से उसकी गुप्त चेष्टा बतला रहे थे। तब तक ब्रह्माजी वहाँ आये और कहने लगे— 'रघुनन्दन ! इसे मैंने स्त्री के हाथ मरने का वरदान दिया है। इसके साथ ही एक बात और है, उसे भी सुन लीजिये। एक दिन इसने मुनियों के बीच शोक से व्याकुल होकर 'चण्डी सीता के कारण मेरा कुल नष्ट हुआ' ऐसा वाक्य कहा। इस पर एक मुनि ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दे दिया— 'दुष्ट ! तूने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तुझे जान से मार डालेंगी।' मुनिका इतना कहना था कि वह दुष्टात्मा उन्हें खा गया। अब क्या था, शेष सब मुनि लोग चुपचाप उसके डर के मारे धीरे से वहाँसे खिसक गये। इसलिये अब उसकी कोई औषध नहीं है। अब तो केवल सीता ही इसके वध में समर्थ हो सकती हैं। ऐसी दशामें रघुनन्दन ! आप उन्हें ही यहाँ बुलाकर इसका तुरंत वध कराने की चेष्टा करें। यही इसके वधका एकमात्र उपाय है।'

इतना कहकर ब्रह्माजी चले गये। भगवान् श्रीरामने भी तुरंत हनुमान्‌जी और विनतानन्दन गरुड को सीता को पुष्पकयान से सुरक्षित ले आने के लिये भेजा। इधर पराम्बा भगवती जनकनन्दिनी सीताजी की बड़ी विचित्र दशा थी। उन्हें श्रीराघवेन्द्र रामचन्द्रके विरह में एक क्षणभर भी चैन नहीं थी। वे बार-बार प्रासाद-शिखर पर चढ़कर देखतीं कि कहीं दक्षिण से पुष्पक पर प्रभु तो नहीं पधार रहे हैं। वहाँ से निराश होकर वे पुनः द्राक्षामण्डप के नीचे शीतलता की आशा में चली जातीं। कभी वे प्रभु की विजय के लिये तुलसी, शिवप्रतिमा, पीपल आदिकी प्रदक्षिणा करतीं और कभी ब्राह्मणों से मन्युसूक्त का पाठ करातीं। कभी वे दुर्गा की पूजा करके यह माँगतीं कि विजयी श्रीराम शीघ्र लौटें और कभी ब्राह्मणों से शतरुद्रिय का जप करातीं। नींद तो उन्हें कभी आती ही न थी। वे दुनियाभर के देवी-देवताओंकी मनौती मनातीं तथा सारे भोगों और श्रृङ्गारोंसे विरत रहतीं। इसी प्रकार युगके समान उनके दिन जा रहे थे कि गरुड और हनुमान्‌जी उनके पास पहुँचे। पति के संदेश को सुनकर सीताजी तुरंत चल दीं और लङ्का में पहुँचकर उन्होंने कल्पवृक्ष के नीचे प्रभु का दर्शन किया। प्रभु ने उनके दौर्बल्य का कारण पूछा। पराम्बा ने लजाते हुए हँसकर कहा— 'स्वामिन् ! यह केवल आपके अभाव में हुआ है। आपके बिना न नींद आती है न भूख लगती है। मैं आपकी वियोगिनी, बस, योगिनी की तरह रात-दिन बलात् आपके ध्यान में पड़ी रही। बाह्य शरीरमें क्या हुआ है, इसका मुझे कोई ज्ञान नहीं।'

तत्पश्चात् प्रभु ने मूलकासुर के पराक्रमादि की बात कही। फिर तो क्या था, भगवती को क्रोध आ गया। उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। वह लङ्का की ओर चली। तब तक वानरों ने भगवान्‌ के संकेत से गुहा में पहुँचकर मूलकासुर को अभिचार से उपरत किया। वह दौड़ता हुआ इनके पीछे चला तो उसका मुकुट गिर पड़ा। तथापि वह रणक्षेत्र में आ गया। छायासीता को देखकर उसने कहा— 'तू भाग जा। मैं स्त्रियों पर पुरुषार्थ नहीं दिखाता।' पर छाया ने कहा— 'मैं तुम्हारी मृत्यु-चण्डी हूँ। तूने मेरे पक्षपाती ब्राह्मण को मार डाला था, अब मैं तुम्हें मारकर उसका ऋण चुकाऊँ।' इतना कहकर उसने मूलक पर पाँच बाण चलाये। मूलक ने भी बाण चलाना शुरू किया। अन्तमें चण्डिकास्त्र चलाकर छाया ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लङ्का के दरवाजे पर जा गिरा। राक्षस हाहाकार करते हुए भाग खड़े हुए। छाया लौटकर सीता के वदनमें प्रवेश कर गयी। तत्पश्चात् विभीषणने प्रभु को पूरी लङ्का दिखायी, क्योंकि पितावचनके कारण पहली बार वे लङ्कामें न जा सके थे। सीताजी ने उन्हें अपना वासस्थल अशोकवन दिखाया। कुछ देरतक वे प्रभु का हाथ पकड़कर उस वाटिका में घूमीं भी। फिर कुछ दिनोंतक लङ्का में रहकर वे सीताजी तथा लव-कुशादिके साथ पुष्पकयानसे अयोध्या लौट आये।

—आनन्दरामायण, राज्यकाण्ड, पूर्वार्ध, अध्याय ५-६

जनकसुता   जग   जननि   जानकी ।
अतिसय   प्रिय  करुना  निधान  की ॥
ताके   जुग   पद    कमल   मनावउँ ।
जासु   कृपाँ   निरमल  मति   पावउँ ॥

#जानकी जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएं !

गिरा अरथ जल बीचि सम
कहिअत  भिन्न  न भिन्न ।
बंदउँ   सीता  राम   पद
जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥

#सुबह_की_राम_राम
#श्रीराम_जयराम_जयजय_राम
#संजय_गोविंद_खोचे